Date: December 31, 2016


Current Affairs

(Week Dec-16  to Dec.24)


Sr. No.


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All Play



Manipur Blockade



सहस दिखाए चुनाव आयोग



One Nation Two Electoin



Demonetisation Articles



Pivot of East



दलित चेतना का आधार



Solar Power






Material For Preliminary Exam



Famous Personality (Mahatma Gandhi)



Test Paper For Pre. (Ancient History)


G.S.Paper II:  Education & Human resources

** A healthy mind is necessary for healthy competition.Grading is a good way to overcome the stress during examinations which keeps the mind of the students healthy. At times one mark less in the examinations makes students underestimate their potential.


** Changes to education policy do not address fundamental problems, risk reopening old wounds.

** Almost every government change in the past 15 years has been accompanied by a change in education policy, whether that of curriculum or related to examinations.


All play

 Indian Express

Five years after the then human resource development minister, Kapil Sibal, nudged the Central Board of Secondary Education (CBSE) into making board examinations optional for Class X students, the country’s premier school examination agency has reportedly decided to make these examinations compulsory again. The CBSE has also asked the schools affiliated to it to implement the three-language formula up to Class X. The Union minister for human resource development, Prakash Javadekar, has said that Sanskrit will be “mandatory” for students in north India while students enrolled in CBSE schools in south India will have to study Hindi. Javadekar has clarified that this should not be seen as a move to impose Hindi. But when the HRD minister roots for one language, the government stands the risk of reigniting old tensions over the language issue. The decision on Sanskrit also defeats the original purpose of the three-language formula: Teaching a modern Indian language, preferably from south India, apart from Hindi and English in the Hindi-speaking states.

The T.S.R. Subramanian Committee on Education had warned against political interference in education. Given that pedagogy has a political purpose, some politics is unavoidable. But the wounds caused by the turmoil over the language agitation in Tamil Nadu, for instance, have long healed and the government should be careful to not open them up again in a state with a long history of resistance to the imposition of Hindi.

It is nobody’s case that the school education system in India should not be reformed. But changes have rarely been well thought out. Take the move to make the Class X exams optional. It was believed that the board exams stressed students, tested their rote learning and did not make allowances for different types of learners and learning environments. But the UPA government’s decision to replace the Class X exams with the continuous comprehensive system of evaluation has run up against problems which should not have been difficult to foresee. There is much fuzziness around what is to be assessed and how. There is no mechanism to use the evaluations to ascertain a child’s educational growth. Teachers have complained that the process adds to their workload. That said, in India, the board exams acquire disproportionate weightage in a student’s academic life. Instead of raking up politically-fraught issues, the CBSE and the government should address these problems.

G.S.Paper II: Function & responsibilities of Union & States

** A UNC spokesman said they have called for blockade of the two national highways in protest against the killing of two persons and injury of two others in police firing at Naga-majority Ukhrul district headquarters on August 30 during a peaceful rally and against the imposition of prohibitory orders under section 144 CrPC.



Ending the Manipur blockade

The Hindu

The blockade of the national highways leading to the Manipur valley, called by the United Naga Council (UNC), has been in place since November 1. This has severely affected life in the State, with shortages and escalating costs of essential supplies such as fuel and food, even as demonetisation has exacerbated problems. Blockades like this are not new to Manipur. In 2011, there was initially a hundred-day-plus blockade enforced by Kuki-led groups, and countered later by Naga groups, which together had a debilitating effect on life in Manipur. This time the blockade is in place to oppose the creation of new districts by the Okram Ibobi Singh government. On December 9 it issued a gazette notification for the creation of seven new districts by bifurcating seven (of a total of nine) districts. This decision had as much to do with long-pending demands — in particular, for a new Kuki-majority district to be carved out of the larger Senapati hill district — as with easing administrative access to far-flung areas from the district headquarters. With State Assembly elections around the corner, the decision by the Congress-led government was also a desperate measure to woo the hill residents. While residents and groups in the new districts have welcomed the decision, the UNC has protested, alleging that areas with a Naga population have been divided and that the lack of consultation is a violation of commitments made by both the Centre and the State in various memoranda of understanding.


साहस दिखाए चुनाव आयोग

दैनिक जागरण

देश के पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में फरवरी-मार्च में विधानसभा के चुनाव होने हैं। जब भी चुनाव आते हैं, चुनाव आयोग का सारा ध्यान नए मतदाता बनाने और चुनावों को सफलतापूर्वक संपन्न कराने में लग जाता है, लेकिन जो असली मुद्दा है कि चुनावों में अच्छे लोग कैसे आगे आएं और अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को चुनाव लड़ने से कैसे रोका जाए वह हाशिये पर चला जाता है। हमारा संविधान हम भारत के लोग’ से शुरू होता है, लेकिन क्या कभी चुनाव आयोग इस बात को सुनिश्चित करने की कोशिश करेगा कि भारतीय लोकतंत्र में अभिव्यक्त ‘हम भारत के लोग’ एक वास्तविकता बन सकें? क्या हम यह कह सकते हैं कि भारत का एक आम नागरिक, जो उस अभिव्यक्ति का अंश है, के भी चुनाव लड़ने और चुने जाने की कोई संभावना है? क्या चुनावों में बढ़ते धनबल और बाहुबल के आगे उसमें चुनाव लड़ने का साहस हो सकता है? देश में चुनाव सुधारों पर बहुत बहस हो चुकी है और अभी भी हो रही है, लेकिन लगता है कि लोकतंत्र में कोई भी निर्वाचित सरकार राजनीतिक कारणों से इस संबंध में कठोर निर्णय लेने के लिए तैयार नहीं।


G.S.Paper II : Salient Features of representation of people’s act


**  चुनाव आयोग निर्वाचित संस्था नहीं है। उसे संवैधानिक स्वायत्तता प्राप्त है और वह जनता को नाराज करने की चिंता से भी मुक्त है।


** जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 8(3) के अंतर्गत यदि न्यायालय द्वारा किसी अभियुक्त को दो वर्ष या उससे अधिक अवधि के कारावास की सजा मिलती है तो तत्काल प्रभाव से उसे चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित कर दिया जाता है और वह अयोग्यता सजा की अवधि खत्म होने के 6 वर्षों बाद तक बनी रहती है। इसी अधिनियम की धारा 62(5) के अंतर्गत जेल में बंद किसी कैदी को वोट देने का अधिकार नहीं है।



वह इस संबंध में कोई निर्णय क्यों नहीं ले सकता? क्या उसके पास अपराधियों को चुनाव लड़ने से रोकने का कोई और रास्ता नहीं? क्या इस संबंध में संवैधानिक और कानूनी प्रावधान उसके मार्ग में बाधक हैं? क्या चुनाव आयोग बिना संविधान और कानून में परिवर्तन किए अपराधियों को चुनाव लड़ने से रोकने की कोई पहल नहीं कर सकता? वर्ष 1993 में राजनीति के अपराधीकरण पर गठित वोहरा समिति को सीबीआइ ने बताया था कि पूरे देश में छोटे-बड़े हर शहर में क्राइम-सिंडीकेट’ बन गए है जो स्वयं में कानून हैं, क्योंकि अपराधियों के गैंग का पुलिस, नौकरशाहों और नेताओं से गठजोड़ हो गया है। उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा आदि राज्यों में अनेक नेता इन अपराधी समूहों के मुखिया हो गए हैं और वे अपने गैंग के सदस्यों को स्थानीय निकायों, विधानसभाओं और लोकसभा में निर्वाचित करा देते हैं। इसीलिए अनेक जनप्रतिनिधि संस्थाओं में अपराधियों की बाढ़ सी आ गई है।

कई लोगों को यह आश्चर्यजनक लगता है कि दो वर्ष से कम अवधि के लिए कारावास की सजा काट रहे अभियुक्त को (जेल में होने के बावजूद) न केवल चुनाव लड़ने का अधिकार है वरन यदि कोई अभियुक्त जमानत पर जेल के बाहर है (चाहे उसे दस वर्ष की जेल क्यों न हुई हो) तो कानून उसे वोट देने का भी अधिकार देता है। सितंबर 2013 में संसद ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 62(5) में संशोधन कर जेल में बंद अभियुक्तों को भी वोट डालने और चुनाव लड़ने का अधिकार प्रदान कर दिया था, लेकिन मुद्दा अभियुक्तों या अपराधियों के मानवाधिकारों का नहीं वरन चुनावों में आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के प्रवेश को रोकने का है। देश में जिस तरह का राजनीतिक माहौल है और जिस प्रकार मानवाधिकारों की दुहाई देकर अपराधियों और अनेक समाजविरोधी तत्वों को बचाया जा रहा उससे डर है कि कहीं लोगों का लोकतंत्र पर भरोसा ही न खत्म हो जाए। हमें तय करना होगा कि लोकतंत्र बड़ा है या मानवाधिकार? क्या लोकतंत्र के बिना मानवाधिकार या अन्य किसी अधिकार की कल्पना भी की जा सकती है? क्या अपराधियों द्वारा संचालित कोई लोकतंत्र जनता के हितों की रक्षा कर सकेगा? क्यों इतनी असहाय है हमारी संसद और न्यायपालिका? आयोग चाहे तो इस समस्या को अपने ढंग से हल कर सकता है।


चुनाव आयोग द्वारा बनाए गए ‘मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट’ का अनुपालन सभी पार्टियां करती है जबकि उसका कोई विधिक आधार नहीं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि उसे चुनाव आयोग ने सभी पार्टियों के विचार-विमर्श से बनाया था। चुनाव आयोग यह देखता है कि सभी दलों द्वारा इस आचार संहिता का पालन किया जाए। सर्वोच्च न्यायालय के 2002 के निर्देश के अनुसार सभी प्रत्याशी हलफनामा देकर सभी आपराधिक मुकदमों की सूचना चुनाव आयोग को देते हैं। अच्छा यह होगा कि चुनाव आयोग इस व्यवस्था का सकारात्मक प्रयोग कर अपराधियों के चुनाव लड़ने पर कोई अंकुश लगाए। चुनाव आयोग विभिन्न दलों से पुन: विमर्श करके यह तय कर सकता है कि किस-किस आपराधिक गतिविधियों में लिप्त आरोपी और अभियुक्त चुनावों में भाग नहीं ले सकेंगे। यह भी तय होना चाहिए कि आयोग की शर्तों का उल्लंघन होने पर क्या कार्रवाई की जा सकती है? यह समय की मांग है कि आयोग ऐसे दलों के विरुद्ध अपने स्तर पर कोई कदम उठा सके जो आपराधिक प्रवृत्ति और छवि के प्रत्याशी खड़ा करते हैं। अगर दलों में इस पर कोई मतैक्य न हो पाए तो आयोग इतना तो कर ही सकता है कि वह आपराधिक छवि और प्रवृत्ति के किसी दलीय प्रत्याशी को दलीय चुनाव चिन्ह से वंचित कर दे। इससे न केवल ऐसे दल की प्रतिष्ठा कम होगी, वरन उस प्रत्याशी को स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ना पड़ेगा। इससे वह दलीय-मतदाताओं के मतों से वंचित हो सकता है और उसके निर्वाचित होने की संभावना क्षीण हो सकेगी।

इसके लिए चुनाव आयोग को केवल अपने चुनाव चिन्ह आवंटन आदेश में संशोधन करना है। संबंधित कानून में किसी संशोधन की जरूरत नहीं। इससे सर्वोच्च-न्यायालय का असली मंतव्य भी पूरा होगा और बिना कानून में बदलाव के चुनाव आयोग चुनावों में अपराधियों के प्रत्याशी बनने पर लगाम लगा सकेगा। जुलाई 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8(4) के अंतर्गत सांसदों और विधायकों को आपराधिक मुकदमों में दंड के बाद प्राप्त तीन माह तक अपील हेतु सदन की सदस्यता की अयोग्यता से उन्मुक्ति को गैर-संवैधानिक करार दिया था। क्या चुनाव आयोग न्यायपालिका की इस पहल को और आगे ले जा सकेगा? यदि ऐसा हो सके तो चुनाव आयोग भारतीय संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित ‘हम भारत के लोग’ की परिकल्पना के अनुरूप भारतीय लोकतंत्र को संचालित करने में अभूतपूर्व योगदान दे सकेगा।



G.S. paper II: Governance; Election Reforms

** The Election Commission of India is an autonomous constitutional authority responsible for administering election processes in India.The body administers elections to the Lok Sabha, Rajya Sabha, state legislatures, and the offices of the President and Vice President in the country.

One nation, Two elections  

Times of India


There is much to be proud of in the democracy that India has become, not only the world’s largest but also its most diverse. Over the decades, we have disproved the many critics who doubted India could remain democratic. But despite this success, our republic suffers from a worrisome shortcoming: too much campaigning, too little governance.

The continual cycle of elections, with several at the state level every year, inevitably impacts governance at the national level. Every such election is a significant distraction for the Union government, since it is inevitably seen as at least a partial referendum on the government’s policies and functioning.That often leads to policy announcements being held up, lest they impact the outcome. And in frequently requiring senior members of the government to be off campaigning, it also acts as a drag on the bandwidth available for governance. Frequent elections impact opposition parties as well, for similar reasons, thus repeatedly polarising political discourse and reducing the room available for compromise.

For India to adequately grapple with its many challenges, the ratio between governing and campaigning must improve at both its national as well as state levels. Certainly, no other democracy has anything quite like this in terms of continual elections. The first four general elections, held in 1951-52, 1957, 1962 and 1967 saw largely simultaneous nationwide exercises for both Parliament and state assemblies. The only two exceptions were Kerala and Odisha, which had midterm elections in 1960 and 1961 respectively.

Thereafter, this broad alignment got further disrupted due to frequent use of Article 356 of the Constitution (President’s Rule of a state), and also a use of Article 352 (Emergency and extension of Lok Sabha’s term by a year).

While Supreme Court judgments have narrowed the scope for application of Article 356, there still continue to be examples of its use, such as in Uttarakhand and Arunachal Pradesh in recent months. Moreover, the lack of a clear mandate, or a midterm collapse, of both Union and state governments have happened often enough to be another major cause of disrupting an aligned election cycle.

The disadvantages of misaligned, continual elections have been long understood, with many proposed solutions mooted over the years by credible individuals and institutions. These have included the Law Commission’s recommendations from as far back as 1999, to more recent ones by a parliamentary standing committee, a white paper by the Election Commission, not to mention exhortations by both the prime minister and president.Some of these proposals largely focus on a one-time reset. With this aim, they include detailed consideration of how to overcome constitutional hurdles, such as extending or curtailing the ongoing terms of various state assemblies in order to synchronise all elections.

While that would indeed serve the immediate purpose, it would only buy time, due to the likely resurgence of misaligned elections. Even if, say, the use of Article 356 becomes passé, the odds are high that over time several state and national elections would yield fractured mandates and mid-term elections.However, the Parliamentary Standing Committee on Personnel, Public Grievances, Law and Justice in its report a year ago has suggested a two-cycle election process. Though all would have the usual five-year terms, one election cycle would include polls for the Lok Sabha and about half the states, and the other cycle would be two and a half years later for the rest of the states.

This elegant alignment would serve multiple objectives. First, it would do a better job of overcoming hurdles. For example, the EC’s earlier idea of a one-cycle election, where a state with a fractured mandate would have a re-election only for the balance of its original five-year term, would likely generate resentment and objections. It would also be less cost-effective.A two-cycle system would simply align such a state’s election to the next cycle, getting it closer to a full five-year term. And that would work just as well for the Lok Sabha, if needed.

Second, a two-cycle alignment of all state and national elections would serve a fundamental democratic purpose, that of rendering broad public opinion to the Union government of the day. As mentioned above, this happens inefficiently today, with its continual distraction and even small, one-state elections creating disproportionate drag on governance.

The proposed alternative of a second election cycle would have voters of about half the country voicing their opinion at the mid-point of the Union government’s term. This would serve as an appropriately sized referendum, congealed together rather than in distracting dribs and drabs.The US has a somewhat similar system – though their mid-term cycle includes elections for some senators a

The proposed alternative of a second election cycle would have voters of about half the country voicing their opinion at the mid-point of the Union government’s term. This would serve as an appropriately sized referendum, congealed together rather than in distracting dribs and drabs.The US has a somewhat similar system – though their mid-term cycle includes elections for some senators and states, and all Congressmen – and it often serves as a wake up call to the federal government.Finally, a two-cycle election system would serve yet another aim of democracy, that of furthering check and balance in the polity. That too happens inefficiently today, stretched out over many individual elections.

Following the parliamentary standing committee report, the Niti Aayog has done a creditable job of going into the nitty-gritty of how such two-cycle elections could work. It is worth taking that forward.The catchphrase “One India, one election” has been gaining traction. In fact, India would be better served by “One nation, two elections”.


इकोनॉमी के कैशलेस होने में कई तरह की अड़चनें

.इकनोमिक टाइम्स


नोटबंदी के बाद कैशलेस लेन-देन पर लोग ज्यादा से ज्यादा सोचने लगे हैं। कुछ ऐसे कारण हैं, जिनकी वजह से पूरी तरह से कैशलेस इकोनॉमी हो पाने में कई तरह की अड़चनें हैं। लोगों काे इस तरीके पर एकदम भरोसा नहीं है। ऑनलाइन धोखाधड़ी के अलावा भी कई पहलू हैं, जिन्हे सुलझाना बहुत आवश्यक है।

नोटबंदी का उद्‌देश्य जो भी रहा हो, लेकिन देश कैशलेस इकोनॉमी की ओर बढ़ रहा है। यानी नकदी का लेन-देन धीरे-धीरे कम होगा। इसका एक अर्थ यह भी होगा कि आपकी बैंकों पर निर्भरता बढ़ती जाएगी। भले ही किराने वाले का महीने का बिल हो या पान वाले का पैसा देना हो, सब कार्ड से पेमेंट स्वीकार रहे हैं। गांवों में इसकी लहर इतनी नहीं है, फिर भी इस तरीके ने जोर पकड़ लिया है। हालांकि, इसमें अभी बहुत सारे अवरोध हैं। ऐसे कई सारे फैक्टर हैं, जिनको निपटा लेने के बाद ही पूरी तरह से ये अड़चनें खत्म हो सकेंगी। ऐसी ही कुछ अड़चनें-

डेटा सिक्योरिटी- नकद के बिना लेन-देन करने में यह सबसे बड़ी अडचन है। यदि हमारे देश के साइबर कानून को देखें तो वह इतने कठोर नहीं हैं कि जिसका नुकसान हुआ हो, उसकी तत्काल भरपाई हो सके। इस कारण भी लोग कैशलेस पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं। कई मामले आए दिन सामने आते रहते हैं, लोगों के साथ धोखा हो जाता है और उनका पैसा तुरंत नहीं मिल पाता है। उसके उलट कई देशों में साइबर कानून बेहद कड़े हैं। यदि किसी के साथ कुछ होता है तो 24-48 घंटे के भीतर विदेशों में उक्त व्यक्ति को अपना पैसा मिल जाता है। जहां तक स्मार्टफोन से भुगतान की बात है तो वह सबसे बड़ी चिंता है। कमजोर कानून के कारण अधिकतर धोखाधड़ी की घटनाएं इसी से संबंधित और इसी पर होते हैं।

आपसी व्यवहार के मसले-आज पेटीएम देश का सबसे बड़ा ई-वॉलेट बनकर उभरा है, लेकिन भारतीय स्टेट बैंक अपने कस्टमर को उनके अकाउंट का पैसा पेटीएम में ट्रांसफर करने की अनुमति नहीं देता है। एसबीआई का खुद का ‘एसबीआई बडी’ है। रिजर्व बैंक ने यूपीआई पेश किया है, यह काफी अच्छा है, लेकिन रिजर्व बैंक ने पेमेंट बैंक को इसका हिस्सा नहीं बनाया है। ऐसे में कस्टमर बड़ी दुविधा में है कि वह ई-वॉलेट का सहारा ले या फिर पेमेंट बैंक का या फिर खुद की बैंक के कार्ड का इस्तेमाल भुगतान में करे और खुद को शुल्क के भार से भी कैसे बचाए। इस तरह के मामलों के कारण कैशलेस भुगतान को ज्यादा से ज्यादा लोग कैसे अपना सकेंगे? कैशलेस इकोनॉमी में जो तरीके हैं, उनमें एकीकरण न होने पर ग्राहक परेशान हैं।

बैंकों पर भार-कैशलेस यानी बैंक पर निर्भरता। देश में बैंकिंग सेवाओं का ऑनलाइन भुगतान नेटवर्क इतना अच्छा नहीं है। खासतौर पर असंगठित वर्ग के मजदूर या रोज कमाकर खाने वालों के लिए यह बेहद मुश्किल है। यहां तक कि कारखानों में काम करने वाले मजदूर भी बैंकिंग सेवाओं से अभ्यस्त नहीं हैं। करीब 20 करोड़ खाते जनधन में खुल पाए हैं। इसमें से अधिकतर एक्टिव नहीं कहे जा सकते। लोगों में इसके प्रति जागरूकता नहीं है।

लागत- कैशलेस के साथ एक और समस्या यह है कि इस तरह का लेन-देन करने पर जो लागत है, वह परेशानी का कारण है। किसी भी दुकान पर जाएंगे तो एक ही वस्तु के दो दाम रहते हैं। किसी वस्तु का दाम दस हजार रुपए हैं तो आपको दस हजार नकद देना होते हैं, लेकिन यदि डेबिट या क्रेडिट कार्ड से भुगतान किया जाना है तो आपको 2 फीसदी अलग से चार्ज देना होगा। बैंक की त्वरित भुगतान की सेवाएं एनईएफटी और आरटीजीएस में भी 5 रुपए से लेकर 20 रुपए तक का शुल्क लगता है। ई- वॉलेट की लोकप्रियता पिछले दिनों बढ़ी है, लेकिन इसमें भी वस्तु की कीमत से अलग 2 से 4 फीसदी तक का शुल्क लगता है। यूपीआई रिजर्व बैंक द्वारा जारी किया गया है और इसमें पैसा बहुत कम लगता है और यह लोगों की जरूरतें आसानी से पूरी कर सकता है, लेकिन इसकी लोकप्रियता उतनी नहीं है, जितनी अन्य भुगतान सुविधाओं की है।

ढांचागत सुविधा के मामले- एक और अहम अड़चन है ढांचागत मामले। फिलहाल देश में 40 करोड़ स्मार्टफोन यूज़र हैं, लेकिन सभी इस पर ऑनलाइन बैंकिंग नहीं करते हैं। न इंटरनेट कनेक्टिविटी है। ऐसे में बैंकों के लेन-देन में ज्यादा समय लग जाता है। न तो दुकानदार और न ही ग्राहक इस तरह के भुगतान के अभ्यस्त हैं। कह सकते हैं कि कैशलेस के लिए बुनियादी सुविधाओं का अभाव है।





ई-रुपया को मुद्रा बनाने से बनेगी बात

दैनिक भास्कर

पुराने पांच सौ और हजार के करेंसी नोट अचानक वापस लेने के कुछ अपेक्षित और अनपेक्षित नतीजे सामने आए हैं। रोजमर्रा की खरीदारी के लिए बैंक नोटों की कम उपलब्धता के कारण जनता का रुझान कम मूल्य के लेन-देन के लिए भुगतान के दूसरे तरीकों की ओर हुआ है। इस निर्णय से असुविधा तो हुई है लेकिन, डिजिटलीकरण अौर शत-प्रतिशत नकदी रहित (कैशलेस) होने के राष्ट्रीय एजेंडे के बारे में हमारे प्रधानमंत्री के विज़न से ज्यादातर लोग प्रेरित हुए हैं।

देश इस इलेक्ट्रॉनिक के ‘ई’ के आयाम खंगाल रहा है और अपने वित्तीय भविष्य के प्रतीक रुपए को डिजिटल स्वरूप देना राष्ट्रीय महत्व का हो गया है। 2020 तक कैशलेस होने का विज़न देखते हुए बुनियादी तौर पर बिल्कुल नई पहल की जरूरत पड़ेगी। प्राइवेट ई-मनी और मोबाइल वॉलेट का परीक्षण किया गया है, हालांकि इनकी कमियां आसानी से पकड़ी जा सकती हैं। इलेक्ट्राॅनिक मनी वाली इकोनॉमी की जटिलता के कारण फिजिकल करेंसी के साथ जुड़ी नकली करेंसी की समस्या और बढ़ जाती है। वैश्विक अर्थव्यवस्थाएं नई और बेहतरीन कार्यविधि अपनाने के लिए नए-नए कदम उठा रही हैं, ऐेसे में हमें भी आधिकारिक डिज़िटल मुद्रा पर प्रतिक्रिया देनी होगी, जो किसी केंद्रीय बैंक की ओर से जारी होने वाली कानूनी रूप से वैध इलेक्ट्राॅनिक मुद्रा होती है। वैश्विक स्तर पर केंद्रीय बैंक आधिकारिक डिज़िटल मुद्रा जारी करने और उसे अपनी व्यवस्था में प्रसारित करने की संभावना का अध्ययन और विश्लेषण कर रहे हैं ताकि मुद्रा के मामलों में बेहतर ढंग से नज़र रखी जा सके और मौद्रिक नीति के मामले में बेहतर नियंत्रण कायम हो सके। तो क्या भारत इस बात के लिए तैयार है कि केंद्रीय बैंक की ओर से जारी एक सम्प्रभु डिज़िटल मुद्रा यानी ई-रुपया को अपनाया जाए?

मुद्रा के विकास के साथ आधिकारिक डिज़िटल मुद्रा ही आगे बढ़ने का रास्ता है। यह सरकार की ओर से जारी सम्प्रभु मुद्रा होगी, लिहाजा भारत में लीगल टेंडर होगी। कागज और सिक्कों के रूप वाली मुद्रा के सुरक्षित विकल्प के रूप में इसका अपना मूल्य और पहचान होगी। केवल केंद्रीय बैंक तय करेगा कि आधिकारिक डिज़िटल मुद्रा की कितनी मात्रा को प्रचलन में लाया जाए, ठीक उसी तरह जैसे नोटों और सिक्कों के बारे में वह निर्णय करता है। आधिकारिक डिज़िटल मुद्रा को अपनाया जा सकता है, क्योंकि यह कागज या सिक्के के समान है और इसके लिए उपकरण के रूप में सिर्फ मोबाइल फोन की आवश्यकता होगी। इसमें कोई अतिरिक्त शुल्क की जरूरत नहीं होगी। इसका वितरण कागज वाली मुद्रा की तरह वाणिज्यिक बैंकों और ई-मनी कंपनियों के माध्यम होगा। आधिकारिक डिज़िटल मुद्रा को इसके विशिष्ट क्रमांक के साथ प्रचलन में लाया जा सकेगा, जिससे नकली मुद्रा की समस्या पैदा न हो। आधिकारिक डिज़िटल मुद्रा पूरी तरह से अंतःप्रचलनीय होगी, लिहाजा इसे कहीं भी इस्तेमाल किया जा सकेगा और इस पर वे बंदिशें भी नहीं होंगी, जो अभी निजी ई-मनी कंपनियों की ओर से लगाई गई हैं। भुगतान तुरंत होगा और इसमें किसी क्लीयरिंग बैंक की जरूरत नहीं रहेगी। आधिकारिक डिज़िटल मुद्रा पर भरोसा रहेगा, क्योंकि इसे जारी करने और इस पर नज़र रखने का काम उच्च सुरक्षा वाली प्रौद्योगिकी से किया जाएगा। इससे हमारे वित्तीय तंत्र और विनियामकीय नियंत्रणों पर और अधिक भरोसा पैदा होगा।

इलेक्ट्राॅनिक रूप में एक सरकारी मुद्रा के उपयोग से नकदी की लागत काफी कम हो जाएगी, क्योंकि इसकी छपाई, इसके वितरण या इसे संभालने और यहां तक कि कागज के नोटों के बेकार घोषित होेने पर उन्हें नष्ट करने जैसे कार्यों पर खर्च की जरूरत नहीं पड़ेगी। वैध मुद्रा के रूप में इससे सब्सिडी, भुगतान, सरकार और व्यक्तियों और इसके उलट मामले में कर के लिए पैसे के लेन-देन में सहूलियत होगी। इस तरह सक्षम व्यवस्था बनेगी, खामियां दूर की जा सकेंगी और प्रभावी प्रशासन सुनिश्चत होगा। मुद्रा का यह रूप अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के लिए भी ज्यादा पारदर्शिता सुनिश्चित करेगी, जबकि अभी कालाबाजारी पर नज़र रखने के मामले में बड़ी चुनौती उत्पन्न हो गई है।

अर्थव्यवस्था में बड़े स्तर पर देखें तो यह माना जाता है कि डिज़िटल वैध मुद्रा का कीमतों और उत्पादन में स्थायित्व पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, जिससे अर्थव्यवस्था को लाभ होगा। अद्यतन सूचना मिलते रहने से पैसे के आवागमन और देश में मुद्रा की आपूर्ति और मुद्रा प्रबंधन की जटिलताओं जैसे मामलों को लेकर मौद्रिक नीति में बदलावों पर नज़र रखने में आसानी होगी। कैशलेस इंडिया बनाने के लिए डिजिटलीकरण को अपनाने से हम पारदर्शिता और आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा दे रहे हैं, वित्तीय समावेशन में इजाफा कर रहे हैं, काले धन से ग्रस्त अर्थव्यवस्था के हिस्से में कमी ला रहे हैं और डिज़िटल काॅमर्स को बढ़ावा दे रहे हैं। मोबाइल सेवाओं और आॅनलाइन भुगतान सेवाओं ने कैशलेस इंडिया के नए रास्ते मुहैया कराए हैं, लेकिन स्पष्टता न होने, नियंत्रण की कमी और अस्पष्ट विनियमन के कारण इससे सरकार के लिए कई चुनौतियां भी पैदा हो रही हैं, जिससे देश की मौद्रिक नीति प्रभावित होगी। संशोधित आधार कार्यक्रम जैसे सरकार के कदमों से उन नागरिकों को वित्तीय सेवाओं से जोड़ने की उम्मीद की जा रही है, जो अभी इनका लाभ नहीं पा रहे हैं और अपने पास मौजूद फिजिकल करेंसी के साथ जूझ रहे हैं। आधिकारिक डिज़िटल मुद्रा के साथ एक असल डिज़िटल अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में भारत ने पहले ही कदम बढ़ा दिए हैं और हमें इसका फायदा उठाना चाहिए।

छोटे-बड़े सभी तरह के लेन-देन को डिज़िटल स्वरूप में ले जाने की जिम्मेदारी हम पर है। इसके बिना किसी नियंत्रण के होने और इस पर किसी निगरानी की जरूरत न होेने की संभावना भी व्यावहारिक है। सौभाग्य से ऐसी आधिकारिक डिज़िटल मुद्रा के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध है। यह केंद्रीय बैंक की ओर से अधिकृत इलेट्राॅनिक संप्रभु मुद्रा होगी और सुरक्षित होगी।

छोटे-बड़े सभी तरह के लेन-देन को डिज़िटल स्वरूप में ले जाने की जिम्मेदारी हम पर है। इसके बिना किसी नियंत्रण के होने और इस पर किसी निगरानी की जरूरत न होेने की संभावना भी व्यावहारिक है। सौभाग्य से ऐसी आधिकारिक डिज़िटल मुद्रा के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध है। यह केंद्रीय बैंक की ओर से अधिकृत इलेट्राॅनिक संप्रभु मुद्रा होगी और सुरक्षित होगी। इस प्रौद्योगिकी और आधिकारिक डिज़िटल मुद्रा के रूप में इसे अपनाने के बारे में दुनियाभर में अध्ययन किए जा रहे हैं। यह व्यवस्था मुद्रा की प्रक्रिया में परिवर्तन लाए बिना इसका रूप बदल देगी। डिज़िटल इंडिया में एक आधिकारिक डिज़िटल मुद्रा का वक्त आ गया है।



ईमानदार व्यवस्था के लिए बहुत कुछ करना होगा



नोटबंदी से जनता को हुई परेशानी के बीच व्यवस्था के ताकतवर लोगों पर कार्रवाई और दिखावटी राजनीतिक दलों को आयकर नोटिस दिए जाने के सुझाव में एक उम्मीद जरूर दिखाई पड़ रही है लेकिन, उससे कोई बहुत बड़ी संभावना नहीं बनती। इन कार्रवाइयों को नोटबंदी को सही साबित करने के लिए पेश किया जाना पूरी तरह से तार्किक इसलिए नहीं बैठता, क्योंकि ये बिना नोटबंदी के भी की जा सकती थीं।

तमिलनाडु के मुख्य सचिव राममोहन राव से आयकर वालों की पूछताछ और चुनाव आयोग की तरफ से उन दो सौ पार्टियों को आयकर नोटिस दिए जाने का सुझाव जो चुनाव लड़े बिना ही चंदा बटोरती रहती हैं, भ्रष्टाचार मिटाने की दिशा में अच्छे कदम हैं। किंतु इन कदमों के लिए मौजूदा माहौल बनाने का औचित्य समझ में नहीं आता। तमिलनाडु के मुख्य सचिव तक आयकर विभाग के हाथ तब पहुंचे हैं जब उनके मोहल्ले में ही श्रीनिवास रेड्‌डी और शेखर रेड्‌डी के घर से 136 करोड़ रुपए की नकदी और 177 किलो सोना बरामद हुआ। रेड्‌डी बंधुओं ने राममोहन राव का नाम लिया इसलिए वे संदेह के घेरे में आ गए। चर्चा के बावजूद इस मामले में किसी राजनेता का नाम नहीं आया है, जबकि मई 2016 में सत्ता में आने के बाद जयललिता ने अपने भरोसेमंद अधिकारी के तौर पर राममोहन राव की नियुक्ति की थी। अगर जयललिता की कार्यप्रणाली संदेहास्पद रही है तो निधन के बाद उनकी उत्तराधिकारी बन रही शशिकला भी कम विवादास्पद नहीं रही हैं। आज फिर तमिलनाडु की सत्ता के इर्द-गिर्द वे ही हावी हैं।

दूसरी तरफ चुनाव आयोग ने जिन 200 कारोबारी पार्टियों को आयकर का नोटिस भेजने का सुझाव दिया है उन्हें इसी एनडीए सरकार ने विदेशी चंदा लेने की कानूनी छूट प्रदान की थी। एक बात बहुत ध्यान से समझ लेनी चाहिए कि भ्रष्टाचार न तो चुनाव जीतने के उद्‌देश्य से की जाने वाली बाजीगारी से दूर होने वाला है और न ही कुछ छापामार लड़ाइयों से। यह लंबी बीमारी है, जिसके पीछे संपू्र्ण व्यवस्था का किसी न किसी स्तर पर सहयोग रहता है। यह लड़ाई नई संस्थाएं बनाने, नई राजनीतिक संस्कृति विकसित करने और नागरिकों में नए किस्म की जिम्मेदारी और सुरक्षा पैदा करने से जीती जा सकेगी। महज सनसनी और भय से हासिल की जाने वाली जीत स्थायी नहीं होती।


निजी बैंकों का नियमन

दैनिक जागरण


केवल इतना ही पर्याप्त नहीं कि नोेटबंदी के बाद निजी क्षेत्र के बैंकों की भूमिका को लेकर सरकार चिंतित है। इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि सरकार और रिजर्व बैंक संदेह के कठघरे में खड़े इन बैंकों के खिलाफ यथासंभव कठोर कार्रवाई करें। इसमें संदेह है कि निजी क्षेत्र के बैंकों के शीर्ष अधिकारियों को दिए गए इस निर्देश से कुछ विशेष हासिल होने वाला है कि वे अपने स्तर पर सख्त कदम उठाएं। क्या ये अधिकारी इससे परिचित नहीं कि उनके तमाम कर्मियों ने किस तरह सरकार और साथ ही आम जनता से विश्वासघात किया? यह बेहद शर्मनाक है कि जब निजी क्षेत्र के बैंकों को आम जनता को राहत देने के लिए हर संभव कोशिश करनी चाहिए थी तब उनकी तमाम शाखाओं के जरिये काले धन वालों का काम आसान हुआ। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि इन बैंकों ने अपने सभी खातों का सत्यापन नहीं किया था। यही खाते गोरखधंधे का जरिया बने।


आखिर रिजर्व बैंक को निजी क्षेत्र के उन बैंकों के खिलाफ कार्रवाई करने में संकोच क्यों होना चाहिए जिन्होंने उसके निर्देशों का पालन करने में हीलाहवाली की? नि:संदेह निजी क्षेत्र के बैंकों के सभी अधिकारियों और कर्मचारियों पर तोहमत नहीं मढ़ी जा सकती। मुट्ठी भर ने ही खुद को काली भेड़ों में तब्दील किया होगा, लेकिन उनकी कारस्तानी से उनके सभी साथी बदनाम हुए। यह कहने में हर्ज नहीं कि निजी क्षेत्र के बैंक संदेह की निगाह से देखे जा रहे हैं और इसके लिए वे खुद के अलावा अन्य किसी को दोष नहीं दो सकते।


निजी क्षेत्र के बैंकों के आला अधिकारी यह कहकर कर्तव्य की इतिश्री नहीं कर सकते कि वे अपने भ्रष्ट कर्मियों के आचरण से शर्मिंदा हैं। उन्हें यह अहसास होना चाहिए कि आम जनता के बीच यह धारणा गहरा गई है कि निजी बैंकों ने जमकर मनमानी की। इस मनमानी के तमाम प्रमाण भी सामने आए हैं। चिंताजनक केवल यही नहीं है कि निजी बैंकों की कई शाखाओं में फर्जी खाते मिले, बल्कि यह भी है कि वे अपने एटीएम में पैसा डालने के मामले में लापरवाह दिखे।

यह एक तथ्य है और इससे न सरकार इन्कार कर सकती है और न ही रिजर्व बैंक कि निजी क्षेत्र के बैंकों के तमाम एटीएम अभी भी ऐसे हैं जिनमें नोटबंदी के बाद से एक भी पैसा नहीं डाला गया। क्या निजी बैंकों से यह पूछताछ नहीं होनी चाहिए थी कि वे एटीएम में पैसा पहुंचाने के मामले में इतने फिसड्डी क्यों साबित हो रहे हैं? अब जब नोटबंदी की अवधि खत्म होने में मुश्किल से एक सप्ताह ही रह गया है तब फिर यह सवाल तो किया ही जाना चाहिए। निजी बैंकों के स्तर पर हुई गड़बड़ी नियामक संस्था यानी रिजर्व बैंक की ढिलाई को भी बयान करती है। यदि नियामक संस्थाएं अपने निर्देशों के उल्लंघन पर सख्ती नहीं दिखाएंगी तो फिर यह नहीं कहा जा सकता कि उन्हें जनता के हितों की परवाह है। बेहतर हो कि रिजर्व बैंक भी अपनी कमजोरी को दूर करे और साथ ही निजी बैंक भी यह समझें कि उनके बारे में जो धारणा बनी है उसे दूर करने के लिए उन्हें कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। केवल चिंता जताने अथवा आश्वासन देने भर से निजी बैंकों के शीर्ष अधिकारी क्षति की भरपाई करने में सफल होने वाले नहीं हैं।


नई आर्थिक राह की जरूरत

फाइनेंसियल टाइम्स


अमेरिकी अर्थव्यवस्था में तेजी और