अमेरिका – ईरान : हाल के मुद्दे एवं भारत का परिपेक्ष्य

दिनांक: July 10, 2019

USA IRAN NUCLEAR DEAL

अक्टूबर  2018 में अमेरिका द्वारा इरान परमाणु समझौते  अर्थात संयुक्त कार्यवाई व्यापक योजना {JCPOA } से स्वयं को प्रथक किये जाने एवं ईरान पर गुप्त तरीके से नाभकीय परियोजनाओ को संचालित कर इस समझौते की अवमानना का आरोप लगाये जाने के बाद से इरान व अमेरिका के मध्य विवादों की ऐसे क्रमिक कड़ी ने जन्म ले लिया , जिस पर ओबामा सरकार के दौरान हुए इरान परमाणु समझौते ने कई वर्षो तक अंकुश लगाया था |

बीते कुछ महीनो से हार्मूज़ जल संधि का क्षेत्र  तनाव और प्रतिक्रियाओं से ग्रसित रहा है | हाल ही में इरान की revolutionery guard ने अमेरिकी गुप्तचर ड्रोन को मार गिराया , इसके लिए इरान ने यह तर्क दिया कि यह ड्रोन उनके क्षेत्र में आ गया था | इस घटना पर अमेरिका का कहना है कि उसका ड्रोन इरान के राज्य क्षेत्र में नहीं बल्कि इंटरनेशनल एयर स्पेस में था |  इस घटना की प्रतिकिया स्वरुप अमेरिका ने इरान के  revolutionery guard पर साइबर अटैक किया |

बीते कुछ महीनो में हार्मूज़ जलसंधि के निकट तनाव का घटनाक्रम :-

  1. अक्टूबर 2018  में अमेरिका ने इरान परमाणु समझौते से स्वयं को बाहर किया |
  2. अमेरिका ने काट्सा एक्ट के तहत इरान से तेल आयत करने पर प्रतिबन्ध लगाया |
  3. अप्रैल 2019 में वाशिंगटन ने इरान की revolutionery guard को आतंकवादी संगठन घोषित किया |
  4. इरान के निकट अपने सैन्य बेस निर्मित करने के प्रयासों के आधीन अमेरिका ने बहरीन में स्थित 5वीं फ्लीट के सहयोग हेतु एयरक्राफ्ट कैरियर अब्राहिम लिंकन को भी वहां भेज दिया |
  5. अर्थव्यवस्था की गिरती हालत व बढाती मुद्रास्फीति से आहात होकर ईरान ने हार्मूज़ जलसंधि को अवरुद्ध करने की धमकी दी |
  6. मई 2019 से हार्मूज़ जलसन्धि के निकट 6 से अधिक तेल टैकरों को क्षतिग्रस्त किया गया जिसका संदेह ईरान पर जताया गया |
  7. ईरान ने इस बात की भी धमकी दी कि यदि यूरोपियन संघ उसके साथ व्यापार नहीं करता तो वह भी समझौते को त्यागकर यूरेनियम  संवर्धन का कार्यं प्रारभं कर परमाणु हथियार कार्यक्रम पुनः संचालित करेगा |

 

ईरान द्वारा आक्रामक नीति अपनाने के कारण :  -

  ईरान  को FATF की ब्लैक लिस्ट में रखा गया है जिस कारण वह प्रति वर्ष भारी आर्थिक क्षति  का सामना कर रहा है |

इसके अतरिक्त अमेरिका के काट्सा एक्ट के कारण भी ईरान को व्यापार आधारित क्षति का सामना करना पड़ रहा है | IMF के अनुसार इरान की अर्थव्यवस्था पतन की ओर है , वर्तमान में वह 40 % से अधिक की मुद्रास्फीति का सामना कर रहा है , जो कि 1980 की इस्लामिक क्रांति के बाद सर्वाधिक है |

इन सब कारणों से ईरान  में जन जीवन अत्यंत क्षतिग्रस्त है फलतः वह आक्रामक निति अपना रहा है |

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ईरान व अमेरिका के मध्य तनाव  से भारत पर प्रभाव  : -

 

  1.  तेल आपूर्ति सम्बन्धी चुनौतिया  :

भारत अपनी आवश्यकता का  80 फीसदी तेल आयत करता है , इस बड़ी आवश्यकता का अधिकांश हिस्सा {लगभग कुल आवश्यकता का 11.5 % } इरान से आयातित करता था | चीन के उपरांत भारत  इरान से तेल आयत में दूसरा सबसे बड़ा देश था अमेरिकी प्रतिबंधों के उपरान्त भारत के तेल आपूर्ति के समक्ष चुनौती आ सकती है |

  1. तेल कीमतों में वृद्धि

ईरान से तेल आयत करने से भारत अनेको छूट  व सेवाएं भी  प्राप्त करता था जैसे भुगतान के लिया 60 दिन का अतरिक्त समय , मुफ्त बीमा , निशुल्क शिपिंग आदि | इसके अतरिक्त कीमतों में भी विशेष  रियायतें मिलती  थी , परन्तु इरान से तेल आयत रुकने  पर   अब यह लाभ नहीं मिल सकेंगे |

अन्य विकल्पों में भारत  को  अमेरिका , मक्सिको आदि दूरस्थ देशों से तेल खरीद करनी पड़ेगी जिसमे अतरिक्त  परिवाहन   खर्च भी आएगा फलतः तेल आयत महंगा हो जायेगा|इन सब से साथ  अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की कम आपूर्ति से भी उसकी वैश्विक कीमते बढेंगी जिससे भारत  में आम जीवन भी प्रभावित होगा |

  1. मुद्रा मूल्य को क्षति :-

अंतर्राष्ट्रीय तेल कीमतों के वृद्धि से भारत को अपने बढती उर्जा जरूरतों की पूर्ति हेतु अधिक डालर खर्च   करने पड़ेंगे | अन्य देशो को भी अधिक डालर खर्च करने पड़ेंगे , जिससे अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में डालर मज़बूत होगा और उसके मुकाबले भारतीय रूपया कमज़ोर होता जायेगा |

  1. रणनीतिक प्रभाव –

भारत इरान में चाबहार बंदरगाह विकसित कर रहा है जिसे चीन के OBOR परियोजना का प्रतियुत्तर मान जा  रहा है| भारत इसके माध्यम से मध्य एशिया तक अपनी पहुँच आसान  करने   की योजना बना  रहा है परन्तु अमेरिकी प्रतिबंधों के प्रभाव में भारत व् इरान के सबंधो में कडुवाहट आ सकती है जिससे  चाबहार बंदरगाह के संबध में भारत  के हित प्रभावित हो सकते है , साथ ही यह पश्चिमी एशिया में भारत की विदेशनीति के संतुलन को भी  प्रभावित कर सकता है |

  1. भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव –

मुद्रा मूल्य घटने एवं उर्जा आपूर्ति चुनौती बढ़ने से भारत में उद्द्योगो की अवसंरचना निर्माण परियोजनाओं के निष्पादन पर बुरा असर पद सकता है |

इसके अतरिक्त हार्मूज़ जलसन्धि क्षेत्र में असुरक्षा का प्रभाव चीन रूस समेत अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ेगा| भारत के सन्दर्भ में कच्चे तेल की कीमत में तेजी भारत के बचत और चालू खाता घाटे तथा भुगतान संतुलन पर भी नकारात्मक  प्रभाव डालेगा |

 

 ईरान की भारत हेतु अन्य उपयोगिताएं

 

  1. भारत में निवेश वृद्धि

ईरान यूरोपी देशों में निवेश हेतु इच्छुक नहीं रहता , क्योंकि अधिकांश यूरोपी देश अमेरिका के हितैषी है | अतः ईरान अपनी निवेश सम्बन्धी संभावनाए भारत में देखता है इसका लाभ भारत में मेक इन इंडिया जैसी योजनाओ को सफल करने हेतु प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्राप्त करने में मिल सकता है |

  1. रूपया रियाल मैकेनिज्म –

इस प्रणाली के तहत तेल आयत हेतु भारत ईरान  को रुपये में भुगतान करता है , जिस रुपये का उपयोग ईरान  भारत से वस्तुएं खरीदने में करता है | इससे भारतीय रुपये की स्थिति  मज़बूत होती है |

  1. मध्य एशिया तक सहज पहुँच –

 भारत ईरान के रास्ते मध्य एशिया  में ताजिकिस्तान ,उजबेकिस्तान , कजाकिस्तान किर्गिस्तान इत्यादि के साथ साथ रूस  व अफगानिस्तान जैसे देशों तक सहज पहुँच स्थापित कर अपनी विदेश नीति को मजबूती  देने की महत्त्वकांक्षा रखता है |

  1. इंटरनेशनल नार्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर

इन प्रतिबंधों से भारत ,इरान, रूस, यूरोप और मध्य एशिया को जोड़ने वाली इस परियोजना को पूर्ण करने में भी व्यवधान उत्पन्न  हो सकते है जिससे भारत के विदेश नीति संबंधी  हित प्रभावित हो सकते है 

 

 इन परिदृश्यों में भारत हेतु विकल्प , सीखें , एवं आवश्यक रणनीतिक राह  :-

प्रमुख सीखें :-

  1. तेल एवं ऊर्जा आपूर्ति हेतु किसी एक राष्ट्र पर अधिक निर्भरता से बचना होगा |
  2. नवीकरणीय ऊर्जा स्त्रोतों के विकल्प को तेजी से विकसित करना होगा |
  3. ई – वाहनों के प्रचलन को बढाकर पेट्रोल एवं डीजल आधारित वाहनों को धीरे धीरे कम करना होगा |
  4. जिस प्रकार अमेरिका ने ईरान पर साइबर हमला किया , भारत को भी मज़बूत साइबर संरचना व सुरक्षा तंत्र विकसित करने पर ध्यान केन्द्रित करना होगा |

 

प्रमुख विकल्प  :-

  1. तत्कालीन विकल्पों के तौर पर भारत को अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सऊदी अरब , ओमान ,युऐई , क़तर आदि देशों से आयत बढ़ाना होगा |
  2. दीर्घकालीन विकल्पों के तौर पर भारत को अपनी नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उत्पादन बढ़ाना होगा एवं नवीन तकनीकियों के द्वारा परंपरागत ईधन के मांग आधारित उपकरणों को फेसआउट करना होगा |

 

      रणनीतिक राह   :-

  1. भारतीय विदेश नीति में ईरान में रणनीतिक महत्व को देखते हुए भारत इरान से व्यापार पर पूर्ण प्रतिबन्ध के स्थान पर व्यापार में कटौती कर सकता है , ताकि ईरान से भी मधुर सम्बन्ध बने रहे |
  2. अमेरिकी प्रतिबन्ध ईरान के साथ किये गए समझौते का उल्लंघन तःथा एकपक्षीय होने के कारण यूरोपीय संघ , रूस तथा चीन इन इन प्रतिबंधों  को सही नहीं मानते   है | यह वैश्विक रवैया रूस ,चीन ,भारत  हेतु उपयोगी हो सकता है |साथ ही यह वैश्विक  मत इन देशों को प्रोत्साहित कर सकता है कि  किस प्रकार   इन प्रतिबंधों निष्प्रभावी  किया जा सकता है | इन प्रयासों हेतु यूरोपीय संघ की  मदद ली जनि चाहिए जो पहले ही अमेरिकी नीतियों  के विरोध का मन बना चुका  है|

 

निष्कर्ष   :-

आवश्यकता है की भारत इन सम्वेदनशील वैश्विक परिस्थितियों में अपने तात्कालिक  व दूरगामी , आर्थिक व रणनीतिक महत्वों को ध्यान में रखते हुए कदम उठाए , क्योंकि भारत हेतु इन दशाओं में  एक सशक्त वैदेशिक नीति के साथ उभरने के अवसर सर्वथा विद्यमान है |