कृत्रिम मीट एवं सेल्युलर एग्रीकल्चर

दिनांक: July 11, 2019

CCMB cellular meat ahimsha meat

तेजी से बढाती जनसँख्या , घटती कृषि उत्पादकता , कृषि पर जलवायु परिवर्तन की मार तथा गरीब देशों में व्याप्त भवयाह भूख संकट इत्यादि से निपटने हेतु खाद्यानो का सहयोग विकल्प खोजना वर्तमान समय की आवश्यकता है |कृत्रिम मीट का उत्पादन इसी दिशा में एक महत्वाकांक्षी प्रयास है |

 

कृत्रिम मीट : परिचय –

कृत्रिम मीट , जिसे कल्चर्ड मीट  अथवा   कोशिका आधारित मीट {cell based meet } भी कहते है, जंतु कोशिका के विकास द्वारा प्रयोगशाला में ही निर्मित किया जाता है |इस प्रकार निर्मित मांस  का स्वाद ,सुगंध, बनावट व अनुभूति लगभग वास्तविक मीट जैसी ही होती है , एकमात्र अंतर इसकी उत्पादन विधि का है |

  निर्माण / उत्पादन विधि  –

इस तरह की मांस के उत्पादन को सेल्युलर एग्रीकल्चर कहा जाता है | जिसमे सिंथेटिक बायोलॉजी का भी इस्तेमाल होता है | सर्वप्रथम किसी भी जंतु की मांसपेशियों से मायोसेटलाइट नामक  स्टेम कोशिकाएं निकाली जाती है , जिनका कार्य उस जंतु के शरीर में नए उतकों का विकास करना होता है |

अब इन कोशिकाओ को प्रयोगशाला में विकास करने हेतु आदर्श परिस्थितियां प्रदान की जाती है फलतः कोशिका विभाजन की क्रिया के द्वारा कृत्रिम मांस तैयार हो जाता है |

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कृत्रिम मीट के पक्ष में तर्क –

  1. वैश्विक भूख संकट का समाधान संभव –

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2050 तक विश्व की जनसँख्या 10 बिलियन से अधिक हो जाएगी , एसे में सभी को भोजन उपलब्ध कराने की सार्वभौमिक चुनौती { विशेष – विकाशशील व गरीब राष्ट्रों में } रहेगी | कृत्रिम मीट इस चुनौती का हल बन सकता है |

  1. कुपोषण समस्या का हल –

स्लैक डेथ के रूप में कुख्यात कुपोषण की वैश्विक समस्या दक्षिण एशिया व अफ्रीका समेत  अनीक  क्षेत्रो में विस्तारित है | कल्चर्ड मीट  के तहत उच्च प्रोटीन युक्त मांस विकसति कर इस समस्या से निपटा जा सकता है |हालाँकि इसके लिए इसे अन्य आवश्यक प्रोटीन का फोर्टीफिकेसन  करना पड़ेगा तथा इसे आर्थिक रूप से वहनीय बनाना होगा

  1. पर्यावरणीय चुनौतियों की ओर तर्कसंगत –

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन के अनुसार, मीट हेतु जतुओं के इस्तेमाल से होने वाला कार्बन उत्सर्जन कुल वैश्विक कार्बन उत्सर्जन का 14.5 % होता है | अतः यदि कल्चर्ड मीट का प्रचालन बढ़ता है , तो इस प्रकार से बढ़ रहे कार्बन फुटप्रिंट में कमी आएगी |

  1. स्वास्थ्य द्रष्टिकोण से सुरक्षित मीट –

प्रयोगशालाओ में निर्मित मीट पूर्णतयः स्वच्छ व जीवाणु  रहित पर्यावरण में विकसित किया जाता है , फलतः उसमे [परंपरागत मीट  में मिलने वाले हानिकारक जीवाणुओं कि सम्भावना नगण्य रहती है इस प्रकार यह मानव स्वास्थ्य द्रष्टिकोण से हितैषी विकल्प है |

  1. पशु कल्याण के दिशा में बेहतर विकल्प –

कृत्रिम मांस के परयूं से मांस हेतु पशुओं को मरने व् उनके प्रति हिंसा के प्रयूग में कमी आएगी जो पशु अधिकारों हेतु आवश्यक है |

  1. संसाधनों की बचत -

कृत्रिम मीट के पक्षधारक यह दर्शाते है कि एक किलोग्राम सामान्य मीत के उत्पादन में कितने अदिक भूमि अन्न जल इत्यादि संसाधनों का निवेश करना पड़ता है |इनका दावा है की सेलुलर एग्रीकल्चर में इन संसाधनों के उपयोग में 70 % की कमी आएगी |

 

कृत्रिम मीट के विपक्ष में तर्क –

 

  1. प्राकृतिक नियमों से संगत नहीं

प्रयोगशाला में मांस का उत्पादन अप्राकृतिक तरीका है , जिसमे जीवित कोशिका से प्रयोगशाला में मांस उत्पादित करने के नैतिक पहलुओ पर मतों में बदलाव है |

  1. स्वास्थ्य परिणामो का पर्याप्त अध्यन नहीं –

जब तक ऐसे कृत्रिम मीट के उपभोग के मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों का पूर्ण अध्यन नहीं हो जाता , इसे प्रचालन में लाना हानिकारक हो सकता है | 

  1. आर्थिक रूप से वहनीय नहीं –

प्रारंभिक रूप से ऐसे मीट की कीमतों की जनसामान्य की वहनीयता के स्तर तक लाने की चुनौती निहित है | क्योंकि अभी इसकी  उत्पादन  की लगत अधिक है |

  1. रोजगारों पर प्रभाव

कृत्रिम मीट  के चलन में आने से परंपरागत रूप से कुकुट पालन , पोल्ट्री , बीफ , पोर्क इत्यादि के उद्योगों में संलग्न लोगों के रोजगारों पर भी नकारत्मक प्रभाव पड़ सकता है |इसके साथ ही रैन्चिंग ट्रकिंग शिपिंग उद्योगों पर भी प्रभाव पद सकते है |

  1. ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रभाव –

कुकुट पालन , मुर्गी पालन इत्यादि क्षेत्र ग्रामीण क्षेत्रों मे  कृषिकों की वैकल्पिक आय का श्रोत भी होते है |

प्रयोगशाला में निर्मित मांस के उत्पादन से इन पर भी कुछ नकारात्मक प्रभाव अवश्य पड़ेंगे |

 

भारत में कल्चर्ड मीट के महत्त्व  –

  1. मांस के उपभोग के सन्दर्भ में भारत में व्याप्त विविध धार्मिक संस्कृतिक विरोधी मतों के संगत  कल्चर्ड मीट , मासं के उपभोग सम्बन्धी पुराने विवादों को सुलझाने हेतु अवसर प्रदान कर सकता है
  2. बढाती जनसँख्या के परिद्रश्य में भारत हेतु खाद्यान सुरक्षा सुनिश्चित करने की ओर यह महत्वपूर्ण  हो सकता है
  3. भारत में अहिंसा मीत के नाम से प्रचलित यह मीट उन जंतु प्रेमी लोगो के हेतु प्रोटीन व् पोषक तत्वों की आवश्यकता को पूरा करने का विकल्प निर्मित  करता है , जो जन्तुओ की हत्या से निर्मित मीत के विरोधी है |
  4. भारत में यह बड़ी संख्या में लोगों तक उच्च गुणवत्ता के पोषक प्रोटीन उपलब्ध करा सकत  है ताकि उन्हें बेहतर स्वास्थ्य प्राप्त हो |

निष्कर्ष –

स्पष्तः वर्तमान जन सांख्यकीय , जलवायुवीय एवं पारस्थितिकीय आवश्यकताओं के संगत कल्चर्ड मीट की अवधारणा , पशु कल्याण एवं खाद्य सुरक्षा की ओर एक क्रांति की भांति विकसित हो सकती है |

भारत सरकार ने इसके आवश्यकता समझते हुए  हैदराबाद स्थित  सेंटर  फॉर सेलुलर एंड मोलेक्युलर बायोलोजी को यह जिम्मेदारी दी है कि वह पांच वर्ष में इसका उत्पादन व्यावसायिक स्तर पर करे |