भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था : 70 वर्षों का मूल्याङ्कन

दिनांक: August 11, 2017

financial inclusion banking reform independence

भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के इतिहास में पिछले 70 वर्ष में अनेक महत्‍वपूर्ण घटनाएं हुईं। इनमें संकट के वर्ष 1966, 1981 तथा 1991 और भारत का आर्थिक संकट से विश्‍व के सबसे तेजी से बढ़ी अर्थव्‍यवथा के रूप में उभरना शामिल है।

वर्ष 1965 में भारत के भुगतान संतुलन की स्थिति दबाव में थी। 1966 के आते-आते हमारा विनिमय भंडार निचले स्‍तर पर आ गया था। मार्च 1966 में अंतरराष्‍ट्रीय मुद्रा कोष ने भारत के लिए 200 मिलियन डॉलर का प्रबंध किया। अंतरराष्‍ट्रीय मूल्‍यों के अनुरूप घरेलू मूल्‍यों को लाने के लिए 36.5 प्रतिशत रूपये का अवमूल्‍यन किया गया ताकि निर्यात स्‍पर्द्धा बढ़ सके। जो अमरीकी डॉलर 4.75 रूपये के बराबर था वह 7.50 रूपये बढ़ गया और पाउंड स्‍टर्लिंग की कीमत 13.33 रूपये से बढ़कर 21 रूपये हो गई। सरकार ने पंचवर्षीय योजना में अवकाश की घोषणा की। दो वर्षों के सूखे, दो युद्ध और रूपये के अवमूल्‍यन के कारण अर्थव्‍यवस्‍था को लड़खडाती देख तीन वार्षिक योजनाओं के पक्ष में चौथी पंचवर्षीय योजना का परित्‍याग कर दिया गया। वार्षिक योजनाओं का निर्देश विकास था और इनमें निर्यात को बढ़ावा देने और औद्योगिक परिसंपत्तियों के कारगर उपयोग की तलाश पर बल दिया गया। अवमूल्‍यन असफल रहा, उसे लक्ष्‍यों की प्राप्ति नहीं हुई। अपेक्षित विदेशी सहायता नहीं मिली।

1979-80 में नाटकीय तरीके से भुगतान संतुलन की स्थिति में परिवर्तन आया। जो मुद्रा स्‍फीति 1978-79 में तीन प्रतिशत थी वह 1979-80 में 22 प्रतिशत हो गई। आयातित पेट्रोल और उर्वरकों की ऊंची कीमतों के कारण व्‍यापार की बाहरी शर्तें खराब हो गईं। व्‍यापार घाटा बढ़ गया। सरकार ने अप्रत्‍याशित रूप में घाटे का वित्‍तपोषण किया। 1981 में लघु अवधि के चक्रीय संतुलन को पूरा करने के लिए भारत ने अंतरराष्‍ट्रीय मुद्रा कोष से पूरक वित्‍तीय सुविधा (सीएफएफ) के अंतर्गत स्‍वीकृत 500 मिलियन एसडीआर में से 266 मिलियन एसडीआर प्राप्‍त किया। सरकार ने पेट्रोल तथा पेट्रोलियम उत्‍पाद, उर्वकर, इस्‍पात, खाद्य तेल, अलौह धातु के घरेलू उत्‍पादन में वृद्धि के कारण भुगतान संतुलन की स्थिति बहाल करने की रणनीति अपनाई। सरकार ने स्‍वेच्‍छा से यह निर्णय लिया कि वह अंतराष्‍ट्रीय मुद्राकोष की विस्‍तारित कोष सुविधा के अंतर्गत 1.1 बिलियन एसडीआर का लाभ नहीं उठायेगी। उस समय की ऊंची मुद्रा स्‍फीति और भुगतान संतुलन की कठिन स्थिति से निपटने में अंतरराष्‍ट्रीय मुद्रा कोष के 1966 और 1981के कार्यक्रमों ने मदद दी। इन कार्यक्रमों से भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था में सुधार लाने में सफलता मिली। भारत ने 1990 के दशक में ढांचागत जटिलताओं और अर्थव्‍यवस्‍था में संतुलन के साथ प्रवेश करते हुए पांच प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि के बावजूद वृहद आर्थिक असंतुलन की घोषणा कर दी। 1991 में भुगतान संतुलन संकट में अनेक प्रतिकूल घरेलू बाहरी घटनाओं ने योगदान दिया। इस संकट से व्‍यापक सुधार का कार्यक्रम उभरा। इसे अंतरराष्‍ट्रीय मुद्राकोष कार्यक्रम का समर्थन था और इसे कारगर तरीके से लागू किया गया।

27 अगस्‍त 1991 को भारत ने अंतरराष्‍ट्रीय मुद्राकोष से 18 महीने के लिए 1656 मिलियन एसडीआर के बराबर राशि की मांग की। समायोजन की इस रणनीति से जुलाई 1991 में स्थिरता के कदम उठाये गये। इन कदमों में विनिमय दर का 18.7 प्रतिशत अवमूल्‍यन और ब्‍याज दरों में वृद्धि सहित मौद्रिक नीति को कठोर बनाना शामिल है। इसका उद्देश्‍य विश्‍वास बहाल करना और लघु अवधि पूजी बाह्यप्रवाह की स्थिति को बदलतना था। वित्‍तीय मजबूती और ढांचागत सुधार के स्‍तंभ पर कार्यक्रम बनाये गये। अनेक प्रकार से 1991/92 के आईएमएफ कार्यक्रम ने वैश्विक अर्थव्‍यवस्‍था में भारत के एकीकरण को सुनिश्चित किया।

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वर्ष 2007 में आए वैश्विक वित्‍तीय संकट ने 2008 में विकराल रूप ले लिया। अनेक अंतरराष्‍ट्रीय वित्‍तीय संस्‍थान धराशायी हो गए। भारतीय स्‍टॉक बाजार में मूल्‍य की दृष्टि से 60 प्रतिशत का नुकसान हुआ। विदेशी पोर्टफोलियों निवेश में कमी आई और डॉलर के 50 रूपये प्रति डॉलर पर पहुंचने के साथ रूपये के मूल्‍य में 20 प्रतिशत की कमी आई। यह धारणा गलत साबित हुई कि भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था पश्चिम से कोई जुडाव नहीं रखती। 7 दिसम्‍बर 2008 और 2 जनवरी 2009 दो पैकेजों के माध्‍यम से वित्‍तीय गति प्रदान की गई। भारतीय रिजर्व बैंक ने मौद्रिक सहजता और तरलता बढ़ाने के अनेक कदम उठाये। इनमें नकद सुरक्षित अनुपात, वैधानिक तरलता अनुपात और महत्‍वपूर्ण नीति दरों में कमी शामिल हैं। इन कदमों का उद्देश्‍य उत्‍पादक क्षेत्रों की आवश्‍यकताओं को पूरा करने के लिए वित्‍तीय प्रणाली से धन उपलब्‍ध करना था।

वैश्विक संकट से विश्‍व में पहले उभरने वाली अर्थव्‍यवस्‍थाओं में भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था थी। वित्‍तीय और मौद्रिक नीतियों से अर्थव्‍यवस्‍था को गति दी गई और विकास दर संकट पूर्व स्‍तर पर आ गई। आवक पूंजी बढ़ने लगी और वित्‍तीय बाजारों की सेहत अच्‍छी होने लगी। अनुमान व्‍यक्‍त किया गया कि वृद्धि दर 2009-10 के 6 ¾ से 2010-11 में 8 प्रतिशत हो जायेगी। भारत के सामने पूजी प्रवाह प्रबंधन की चुनौती आई और इस दिशा में हस्‍तक्षेप किया गया ताकि विनिमय दर के उतार चढ़ाव को कम किया जा सके।

8 अक्‍टूबर 2016 को भारत के वित्‍त मंत्री ने फंड बैंक वार्षिक बैठकों के दौरान अंतरराष्‍ट्रीय मुद्रा और वित्‍तीय समिति (आईएमएफसी) को संबोधित किया और 7.2 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि, 372 बिलियन डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार, (-) 1.1 प्रतिशत चालू खाता घाटा और 5.05 प्रतिशत मुद्रा स्‍फीति दर के साथ भारत को विश्‍व की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्‍यवस्‍था बताया। सरकार ने वित्‍तीय मजबूती, निजी क्षेत्र को कम लागत पर ऋण देने और मूल्‍य स्थिरता का संकल्‍प व्‍यक्‍त किया। सब्सिडी सुधार कार्यक्रम शुरू किया गया और तेल सब्सिडी को आधार से जोड़कर सब्सिडी के बेहतर लक्ष्‍य को प्राप्‍त करने का काम किया गया। सरकार ने एक उच्‍चाधिकार प्राप्‍त मौद्रिक नीति समिति बनाई और 2016-2021 अवधि के लिए +/- 2 स्‍तर के उतार चढ़ाव के साथ चार प्रतिशत का मुद्रास्‍फीति लक्ष्‍य तय किया। कर सुधारों में वस्‍तु एवं सेवाकर (जीएसटी) मील का पत्‍थर है। भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था की 70 वर्ष की कहानी यह बताती है कि भारत आईएमएफ कार्यक्रम वाले देश से आगे बढ़कर विश्‍व की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्‍यवस्‍था वाला देश हो गया है।