स्वामी विवेकानंद के शिकागो संबोधन की 125 वीं वर्षगांठ

दिनांक: September 11, 2017

Swami Vivekananda Chicago India Religion

देश के ही नहीं दुनिया भर में ‘परम ज्ञानी’ के तौर पर मशहूर विद्यमान स्वामी विवेकानंद के उस भाषण का आज 125 वां वर्षगांठ है जो उन्होंने शिकागो में दिया था। पूरी दुनिया और खास कर भारत के लिए विवेकानंद का यह भाषण ऐतिहासिक भाषण है।
स्वामी विवेकानंद के विश्व प्रसिद्ध शिकागो भाषण की 125वीं वर्षगांठ पर पीएम मोदी ने विज्ञान भवन में 'युवा भारत, नया भारत' विषय पर युवाओं को संबोधित किया। पीएम ने एक तरफ स्वामी विवेकानंद को देश-दुनिया के गौरव से जोड़ते हुए युवाओं को उनकी ही तरह संकल्प लेने को प्रेरित किया

कौन थे स्वामी विवेकानंद?

स्वामी विवेकानन्द वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे. उनका वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था. उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में साल 1893 में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था. भारत का आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वेदान्त दर्शन अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द की वक्तृता के कारण ही पहुंचा था. भारत में विवेकानंद को एक देशभक्त संत के रूप में माना जाता है और इनके जन्मदिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है.

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स्वामी विवेकानन्द ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो आज भी अपना काम कर रहा है. वे रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य थे. उन्हें प्रमुख रूप से उनके भाषण की शुरुआत मेरे अमरीकी भाइयो और बहनों के साथ करने के लिये जाना जाता है. उनके संबोधन के इस प्रथम वाक्य ने सबका दिल जीत लिया था. आज पीएम ने भी अपने भाषण में इसका जिक्र किया है.

125 साल बाद भी प्रासंगिक है स्वामी विवेकानन्द का शिकागो भाषण, क्यों?

दुनिया में कोई ऐसा भाषण नहीं मिलता जिसका संबोधन दिवस बर्थ डे की तरह मनाया जाता हो।इसी बात से स्वामी विवेकानन्द के चिरस्मरणीय भाषण की ऐतिहासिकता साबित हो जाती है। आखिर उस भाषण में ऐसा क्या था जिसने दुनिया को अचम्भित कर दिया! भाषण लिखित है, वेबसाइट से लेकर पुस्तकों में दुनिया भर में अंग्रेजी, हिन्दी समेत सभी भाषाओं में उपलब्ध है।

प्रमुख बिंदु -

१- महिला-पुरुष में बंटी नहीं, भाई-बहन बनकर जुड़ी हुई है दुनिया पहली बात जो दुनिया जानती है कि स्वामी विवेकानन्द ने अपने संबोधन में "मेरे अमेरिकी भाइयो और बहनो" कहकर अपना भाषण शुरू किया था और यह संबोधन सुनकर सभागार कई मिनट तक तालियां पीटता रह गया। यह संबोधन नया था उन लोगों के लिए, जो दुनिया को महिला और पुरुष में बांटकर देखने की आदी रही थी। स्वामी विवेकानन्द ने हर स्त्री और हर पुरुष में भाई और बहन का संबंध दिखाया था। मानव-मानव में रिश्ता समझाया था।

२- प्रेरणा की धरती है भारत भूमि भाषण के आरम्भ में ही स्वामी विवेकानन्द ने यह जता दिया था कि जिस भारत भूमि का वे प्रतिनिधित्व कर रहे हैं वह संन्यासियों की परंपरा के लिहाज से सबसे प्राचीन है जिसने दुनिया को धर्म का मार्ग दिखाया है और जो पूरब में ज्ञान का सूरज रहा है। महज गौरवपूर्ण अभिव्यक्ति की परंपरा से नहीं, बल्कि उदाहरणों के जरिए स्वामी विवेकानन्द ने उपस्थित धर्म सम्मेलन को जता दिया कि न सिर्फ भारत भूमि सहिष्णु रही है बल्कि सार्वभौमिकता का आगे बढ-चढ़ कर पालन करने वाली धरती रही है। स्वामी विवेकानन्द ने यह बात जोर देकर समझायी थी कि दुनिया में यही इकलौती धरती है जिसने सभी धर्म को उनके लिए सबसे जरूरत की घड़ी में आश्रय दिया- चाहे वे पारसी हों, या इजराइली या फिर कोई और।

३- रास्ते अलग हैं पर गंतव्य है एक स्वामी विवेकानन्द ने धर्म सम्मेलन में मौजूद दुनिया के विद्वानों को संस्कृत के श्लोक पढ़कर यह बात समझायी थी कि भारत की धरती देवभूमि रही है। ईश्वर प्राप्ति के मार्ग चाहे अलग-अलग हों, लेकिन सभी आखिरकार समुद्र की तरह ईश्वर के चरण में ही पहुंचते हैं। गीता के श्लोक से स्वामीजी ने ईश्वरीय वाक्य दोहराए थे जिसमें कहा गया था कि जो मेरी ओर आता है, मैं उसकी ओर चला आता हूं। अलग-अलग मार्गों से लोग मेरी ओर ही आते हैं।

४- दूसरे धर्म को नष्ट करने से नहीं होता है धर्म का प्रचार स्वामीजी ने धर्म के प्रचार-प्रसार का मतलब समझाते हुए कहा था कि दूसरे धर्म को नष्ट करना किसी धर्म का प्रचार करने का तरीका नहीं हो सकता। उन्होंने धर्मांधता का विरोध करने और मानवता को प्रतिष्ठित करने की अपील दुनिया भर के धर्मावलंबियों से की थी।

५- आज भी दुनिया को चाहिए को स्वामीजी की सीख आज स्वामीजी के शिकागो भाषण के 125वें वार्षिक दिवस पर दुनिया एक बार फिर शांति, भाईचारा मांग रही है, कट्टरता तोड़ने की ज़रूरत महसूस कर रही है। शान्ति में भारत की भूमिका और अहमियत वैसी ही है जैसा कि स्वामी विवेकानन्दजी ने कहा था। कहने का अर्थ ये है कि स्वामीजी के भाषण को इस दिन दुनिया के सामने उसी मजबूती के साथ रखने की जरूरत है जिस हिसाब से स्वामीजी ने रखा था। ऐसा करके ही हम विश्व कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।