कुलभूषण जाधव मामला,अंतरराष्ट्रीय अदालत एवं वियना कन्वेंशन ऑन कांसुलर रिलेशन

दिनांक: July 18, 2019

vienna convention international court of justice

 कुलभूषण जाधव मामले में इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस ने अपना निर्णय देते हुए उनकी फांसी पर रोक लगा दी है न्यायालय ने पाकिस्तान को बिना कन्वेंशन के तहत भारत को कुलभूषण जाधव तक काउंसलर एक्सेस मुहैया कराने और फांसी की सजा की समीक्षा का आदेश दिया |

 

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय द्वारा इस मामले में प्रतिक्रिया

 

  • आईसीजे के जजों ने सर्वसम्मति से माना कि उनके पास 8 मई सन 2017  को भारत की तरफ से दर्ज कराए गए आवेदन को स्वीकार करने का अधिकार है इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस ने कहा कि काउंसलर रिलेशंस पर 1963 के वियना कन्वेंशन के तहत मामला उसके अधिकार क्षेत्र में आता है
  • इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस ने 15-1 से निर्णय दिया कि पाकिस्तान  कुलभूषण जाधव को वियना कन्वेंशन की आर्टिकल 36 {1- बी} के तहत काउंसलर एक्सेस के जो अधिकार मिले थे उसके बारे में उन्हें जानकारी ना देकर शर्तों का उल्लंघन किया है
  • कोर्ट ने यह भी कहा कि वियना कन्वेंशन के आर्टिकल 36 पैराग्राफ 1{b} के तहत भारत को अपने नागरिक तक पहुंच और उसकी मदद करने का अधिकार है पाकिस्तान ने भारत को जाधव से बातचीत करने उन तक पहुंच होने हिरासत  ने उनसे मिलने और उनके लिए कानूनी सहायता उपलब्ध कराने के अधिकारों से वंचित किया यह वियना कन्वेंशन के आर्टिकल 36 पैराग्राफ 1 {a} व  {c}  का उल्लंघन है
  • तथापि जजों ने भारत की कुलभूषण यादव को दोषी ठहराने वाले फैसले को रद्द करने उन्हें रिहा करने और स्वदेश भेजने की मांग को ठुकरा दिया है

घटना की पृष्ठभूमि एवं दोनों देशों के पक्ष

  • गत वर्ष पाकिस्तान ने जासूसी करने का आधार देते हुए कुलभूषण जाधव को बलूचिस्तान प्रांत से गिरफ्तार करने की जानकारी दी इस पर प्रतिक्रिया देते हुए भारत ने कहा कि कुलभूषण जाधव भारतीय नागरिक हैं लेकिन उनके जासूस होने की बात से इनकार किया भारत के अनुसार कुलभूषण ईरान में कानूनी तरीके से अपना कारोबार चला रहे थे और उनके अपहरण की आशंका व्यक्त की |
  • इसके उपरांत भारत सरकार ने पाकिस्तान में कैद कुलभूषण की कानूनी सहायता हेतु काउंसलर एक्सेस के लिए पाकिस्तान से 15 से अधिक बार निवेदन किया परंतु पाकिस्तान ने इसे ठुकरा दिया फलतः भारत ने इसे वियना संधि का उल्लंघन मानते हुए अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का रुख किया|

 

 

वियना संधि क्या है

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  • आजाद और संप्रभु देशों के बीच आपसी राजनयिक संबंधों को लेकर सर्वप्रथम 1961 में विएना कन्वेंशन ऑफ डिप्लोमेटिक रिलेशंस हुआ इसके तहत उल्लिखित कुल 54 आर्टिकल में राजनयिकों को विदेशी राज्य में सुरक्षा संबंधी विशेष अधिकार दिए गए|
  • इस संधि के मुख्य प्रावधानों के तहत कोई भी देश दूसरे देश के राजनयिकों को किसी भी कानूनी मामले में गिरफ्तार नहीं कर सकता है साथ ही राजनयिकों के ऊपर मेजबान देश में किसी तरह का कस्टम टैक्स नहीं लगता यह कन्वेंशन राजनयिकों के साथ रह रहे परिवार को भी समान संरक्षण प्रदान करता है|
  • इसके 2 वर्ष उपरांत 1963 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने इसी संघ से मिलती-जुलती एक और संधि  निर्मित की  इसे विएना कन्वेंशन ऑन काउंसलर रिलेशंस के नाम से जाना जाता है इस संधि पर अब तक 179 देश सहमति दे चुके हैं तथा इसमें 79 आर्टिकल हैं |
  • भारत का पाकिस्तान भी इसे अपनी सहमति दे चुके हैं फलतः भारत ने इसी का आधार लेकर इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस का रुख किया |

 

मुख्य प्रावधान

  1. आर्टिकल 31 के तहत मेजबान देश किसी राष्ट्र के दूतावास में नहीं प्रवेश कर सकता और उसे दूतावास की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उठानी है
  2. आर्टिकल 36 के तहत यदि किसी विदेशी नागरिक को कोई देश अपनी सीमा के भीतर गिरफ्तार करता है तो संबंधित राष्ट्र के दूतावास को तत्काल सूचित करना होगा|
  3. गिरफ्तार किए गए विदेशी नागरिक के आग्रह पर पुलिस को संबंधित दूतावास को फैक्स  करके सूचना देनी होगी जिसमें गिरफ्तार व्यक्ति का नाम गिरफ्तारी की जगह व गिरफ्तारी की वजह बतानी होगी|
  4. यह संधि विदेशी सीमा में गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को कानूनी सहायता हेतु काउंसलर एक्सेस दिए जाने की भी व्यवस्था करता है |

इस संधि का भागीदार होने के बावजूद भी पाकिस्तान भारत को राजनीत पहुंच देने से क्यों मना कर रहा है?

  • इस संधि में या भी प्रावधान है राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों आदमी गिरफ्तार विदेशी नागरिक को राजनायिक पहुंच के अधिकार से वंचित भी किया जा सकता है विशेषकर तब जब दोनों देश इस मसले पर कोई आपसी समझौता कर रखा है
  • भारत और पाकिस्तान के मध्य 2008 में इसी प्रकार का समझौता हुआ था अतः क्योंकि पाकिस्तान जाधव को जासूसी के मामले में गिरफ्तार करने का दावा करता है अतः इसी समझौते का हवाला देकर जाधव को राजनायिक पहुंच देने से इनकार कर रहा है

 

क्या है अंतरराष्ट्रीय न्यायालय?

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  • इसका गठन 1945 में संयुक्त राष्ट्र की घोषणा पत्र द्वारा हुआ तथा इसने अप्रैल 1946 से कार्य करना प्रारंभ किया|
  • मुख्यालय  हेग {नीदरलैंड्स} यह संयुक्त राष्ट्र की प्रमुख न्यायिक संस्था है|
  • संयुक्त राष्ट्र की अन्य प्रमुख संस्थाओं के विपरीत यह एकमात्र प्रमुख संस्था है जो न्यूयार्क  में अवस्थित नहीं है यह परमानेंट कोर्ट ऑफ़ इंटरनेशनल जस्टिस का उत्तराधिकारी है जो कि लीग ऑफ नेशंस के आधीन 1920 में गठित हुआ था|
  • संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य आईसीजे के सदस्य हैं आईसीजे में संयुक्त राष्ट्र की सामान्य सभा व सुरक्षा परिषद द्वारा चयनित 15 न्यायाधीश होते हैं जिनका कार्यकाल 9  वर्ष का होता है|
  • यह विभिन्न राष्ट्रों के मध्य विधिक विवादों का निपटारा करता है तथा संयुक्त राष्ट्र के अन्य विशेष एजेंसियों द्वारा निद्रिष्ट  कानून सवालों पर अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार सलाहकारी राय भी देता है|
  • अंतरराष्ट्रीय संगठनों के अन्य अंगों के विपरीत न्यायालय विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों से निर्मित नहीं है अर्थात न्यायालय के सदस्य पूर्णतः  स्वतंत्र होते हैं जिनका प्रथम कार्य निष्पक्ष भाव से अपना कर्तव्य निभाना होता है|

 आईसीजी में अब तक भारत के जज

1 - दलवीर भंडारी

2 - रघुनंदन पाठक

3-  नागेंद्र सिंह

4- सर बेनेगल राव

 

 न्यायाधिकार एवं कार्य पद्धति

आईसीजे 2  तरह के न्यायिक अधिकार के आधीन विश्व न्यायालय की भांति कार्य करता है

  • 1 विधिक विवाद विभिन्न राष्ट्रों के मध्य दो सलाहकारी राय देने के अनुरोध पर विवाद ग्रस्त मामलों में आईसीजे का निर्णय पार्टियों पर बाध्यकारी होता है तथा उस पर अपील भी नहीं की जा सकती
  • सलाहकारी मामलों में आईसीजे की राय  बाध्यकारी  नहीं रहती |

 

  आईसीजी की कार्यपद्धतियों की सीमाएं

 

  1. युद्ध के अपराधियों या मानवता के खिलाफ अपराधों के आरोपी व्यक्तियों का मामला इसमें नहीं चलाया जा सकता क्योंकि या एक आपराधिक न्यायालय नहीं है इसलिए इस प्रकार के मामले नहीं देख सकती
  2. इसे मामलों को स्वतः संज्ञान में लेने की शक्ति नहीं है तथा या केवल उन्हें विवादों की सुनवाई कर सकता है जिस के संबंध में अपील की गई हो
  3. इसे केवल सहमति आधारित अधिकार क्षेत्र प्राप्त हैं ना कि अनिवार्य अधिकार क्षेत्र|